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History

हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर का श्रीमार्कण्डेय  तीर्थ  बिलासपुर शहर से  20 किलो मीटर दूर वर्तमान में मारकंड(माकड़ी ) गांव में स्थित है | इसी स्थान पर सन्यासी मुनि मृकण्डु तथा उनकी पतिव्रता साध्वी पत्नी श्रीमती हुलसी अर्थात मनस्विनी देवी संध्या वंदना तथा साधना में रहते थे | एक दिन मृकण्डु और उनकी पत्नी प्रातः कालीन योगिक क्रियाओं में व्यस्त थे ,तभी उनका ध्यान सहतूत के पेड़ पर चहचहाती चिड़ियों की ओर गया  |चिडीया ओर अन्य पक्षी अपने चूजों को उड़ने क अभ्यास करवाते तथा दाना चुगना सिखाते ,इस्वर वंदना करते हुए पर्म पिता परमत्मा  का आवाहन करने लगे |प्रभु  नर नारायण अपने भक्तो की करुणा  विनती सुनी और प्रकट हो कर बोले मेरे प्रिय भक्तो यह केसा मोह की तुम्हे भी गृहस्थ धर्म निर्वाह का ध्यान आ गया |प्रभु वर बोले प्रिय भक्तो तुम्हारे भाग्य में संतान नहीं तो भी तुम्हारे तप बल योग ध्यान साधना से प्रसन्न हो कर में तुम्हे पुत्रवान होने का वर देता हु ,मगर इसकी आयु केवल 12 वर्ष ही होगी |मृकण्डु ने मार्कण्डेय का समय से पूर्व ही महाऋषि व्यास के कर कमलो से उपनयन (यगोपवीत) संस्कार करवाने का निस्चय किया |देवीय प्रेरणा से महाऋषि व्यास जी ने ऋषि बालक मार्कण्डेय का गुरु बनने  की सहमति दे दी |इस प्रकार गुरु पद प्राप्त कर व्यास जी ने अपने बाल शिष्य को गुरु मंत्र दिया |

अल्प आयु होने के कारण इसका  उपाय प्रजा पति ब्रह्मः जी को छोड़ कर अन्य कोई शक्ति नहीं जो मार्कण्डेय को इस  विपत्ति  से बचा सके |सप्तऋषिओं ने मृकण्डु से मार्कण्डेय को  साथ ले जाने की इच्छा व्यकत  कर उसे भेजने का आग्रह किआ तथा सप्तऋषियों के साथ मार्कण्डेय ब्रह्मलोक पहुंचे तथा प्रजापति ब्रह्मा जी को विनम्र प्रणाम किया तथा बालक मार्कण्डेय को दीर्घायु का आशीर्वाद दिया तथा बालक मार्कण्डेय ने अभिवादन,सेवा,त्याग,साधना व् व्रत के प्रभाव से  सब का आशीर्वाद प्राप्त कर मृत्यु को भी जीत लिया तथा चिर यौवन रहने तथा अजर -अमर होने का वर देता हूँ | नारायण की तपस्या में जब काफी समय बीत गया तब उनके प्रभाव से इंद्र का आसन डोलने लगा |उसे भय हुआ  की बालक मार्कण्डेय मृयत्यु जितने के साथ-साथ मुझसे मेरा स्वर्ग  भी न छीन ले | इसी से भयभीत इंद्र ने मार्कण्डेय की तपस्या बहन करने के लिए अपना माया जाल रचा | जनश्रुति के अनुसार अपने इस काम के लिए अपने प्रिय सेवको गन्धर्व अप्सराओं,काम,वसंत,मलयानिल,लोभ,मद आदि को भेजा | इसमें सबसे पहले इंद्र दूत वटी कृष्ण तथा अप्सरा रोहिणी और महोदधि की बारी आयी | अप्सराएँ नृत्य करती मार्कण्डेय को लुभाने  की कोशिश करने लगी | जब उनके सरे यत्न विफल हो गए,मुनि के तप प्रभाव से अप्सराएँ  जहां के तहाँ जड़ हो गयी |इंद्र ने जब अपनी असफलता का समाचार सुना तो वह आस्चर्य चकित हो गए | क्षमा याचना के लिए मुनि श्रेष्ठ के पास गए तथा माफ़ी मांगी | इंद्र दमन,वटीकृष्ण ,महोदधि ,रोहणी,ये सभी स्थान मार्कण्ड के एक किलोमीटर दायरे  में है | जहां पर स्न्नान करना अत्ति उत्तम माना जाता है | मार्कण्ड तीर्थ के पांच सथानो में जो स्न्नान करता है वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है |

मार्कण्डेय व्यास गुफा से जुडी वर्तमान बंदला पहाड़ी के निचे विशालकाय चट्टान पर बने शिवलिंग के सामने मार्कण्डेय महामृत्युंजय जाप और प्रार्थना कर रहे थे ठीक उसी समय मार्कण्डेय का मृत्यु समय जान कर यमराज ने अपने यमदूत भेजे परन्तु भक्ति के प्रभाव से वे मुनि के पास न आ सके मार्कण्डेय ने घबराकर पूरी ताकत से शिवलिंग को पकड़ लिया तथा उसी समय शिवलिंग से शिव पारवती प्रकट हुए तथा मार्कण्डेय जी को चिरायु (चार युग)का वरदान दिया |मान्यता है की जिन औरतो की संतान नहीं होती उन औरतों के द्वारा मार्कण्डेय जी की मूर्ति की आँखों में काजल लगाने मात्र से ही एक वर्ष के अंदर संतान प्राप्ति हो जाती है |हर वर्ष मार्कण्डेय  मंदिर परिषर में हर वैशाखी को भरी मेला लगता है|